4 अगस्त 2020 - 14:06
ईदे क़ुरबान पर विशेष कार्यक्रम

ईदे क़ुरबान व बक़रीद है।

 लोग नमाज़ पढ़कर क़ुर्बानी कराते हैं।  बच्चे, बड़े बूढ़े, जवान सभी ईद की नमाज़ अदा करते हैं लेकिन इस साल कोरोना महामारी की वजह से इस साल लोग ईदे क़ुरबान की नमाज़ मस्जिदों व ईदगाहों में अदा नहीं कर सकेंगे। यह प्रेम और समर्पण को साबित करने का दिन है। बक़रीद का दिन वह दिन है जब एक इंसान स्वयं को अपने पालनहार के सामने महत्वहीन होने की बात स्वीकार करता है। वह अपना सब कुछ ईश्वर की उपासना पर न्योछावर कर देता है। आज इंसान प्रदर्शन करता है उस आज्ञापालन का जो सही पहचान और बोध का परिणाम है।

ईदे क़ुरबान, ईश्वरीय आदेश के सक्षम हज़रत इब्राहीम और इस्माईल के नतमस्तक होने का प्रतीक है। ईद के दिन क़ुरबानी करना, ईश्वरीय सामिप्य प्राप्त करने के लिए ईश्वरीय दूत हज़रत इब्राहीम की परंपरा पर अमल करने का नाम है। हज़रत इब्राहीम ने ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने के लिए अपने प्रिय पुत्र हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को ईश्वर के मार्ग में क़ुरबान कर दिया। ईश्वर ने भी जब उनके आत्मसमर्पण और उपासना के चरम को देखा तो उसने हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को बचा लिया और भेड़ को कुरबान होने के लिए भेज दिया।

कुर्बान शब्द कुर्ब से बना है जिसका अर्थ सामिप्य होता है। कुर्बानी इस बात की परिचायक है कि समस्त कुर्बानी में महान ईश्वर का सामिप्य दृष्टिगत होता है। कुर्बानी हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के समय से है। हज़रत हाबील और क़ाबिल के बीच कुर्बानी को ही लेकर विवाद हुआ था। महान व सर्वस

जानवर की कुर्बानी इंसान के अंदर के जानवर की कुर्बानी का प्रतीक है। इस कुर्बानी से इंसान को यह शिक्षा मिलती है कि मानवीय परिपूर्णता तक पहुंचने के लिए इंसान को अपने अंदर के जानवर को प्रकट होने का अवसर नहीं देना चाहिये। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने एतिहासिक कार्य से दर्शा दिया कि महान ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने के लिए स्वयं को हर प्रकार की अपवित्रता से पवित्र करना चाहिये और अपने अस्तित्व को पापों के मोर्चे से स्वच्छ बनाना चाहिये ताकि वास्तविकता के प्रकाश को देख सकें। ईश्वरीय वाणी को सुनने के लिए अपनी आंतरिक इच्छाओं से मुकाबला करना चाहिये ताकि महान ईश्वर की बारगाह में प्रवेश के योग्य बन सकें। ईदे कुर्बान का दिन इस कार्य के लिए बेहतरीन अवसर है पंरतु हर इंसान को देखना चाहिये कि किस वजह से उसका दिल दुनिया से लगा हुआ है और उसकी सीमा कहां तक है। इंसान, ईमान और महान ईश्वर के प्रेम में वह कार्य कर सकता है जिसे सामान्य इंसान नहीं कर सकता। इसी कारण रहस्यवादियों के कथनों में आया है कि यह ईश्वर नहीं है जो कुरबानी चाहता है बल्कि यह प्रेमी है जिसे उसकी आवश्यकता है। प्रेमी प्रेम करने वाले को दिखाना चाहता है कि वह उच्च शिखर पर पहुंच सकता है और महान ईश्वर के भले व अच्छे बंदों में शामिल हो सकता है।

ईदे फ़ित्र, पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी की घोषणा के दिन मनाई जाने वाली ईद, ईदे ग़दीर और ईदे क़ुरबान, बहुत ही अहम घटनाओं को याद दिलाती हैं और उन लोगों के लिए एक पाठ होती है जो पाठ सीखना चाहते हैं। ईद उस दिन को कहा जाता है जब मोमिनों पर ईश्वर की अनुकंपाएं उतरती हैं।  इस्लामी संस्कृति में भी ईद उस दिन को कहते हैं जिस दिन इंसान से कोई पाप न हो।

प्रतिवर्ष बक़रीद के दिन मुसलमान, क़ुर्बानी करके हज़रत इब्राहीम की याद ताज़ा करते हैं। बक़रीद, मुसलमानों की दूसरी सबसे बड़ी ईद है।  यही वह दिन है जब मक्के में मुसलमान हज करते हैं। इस महान ईद को मनाने का मुख्य कारण यह है कि एक ईश्वरीय दूत ने ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अपना सबकुछ न्योछाव करने का फैसला किया यहां तक कि अपने बेटे की क़ुर्बानी के लिए भी वह तैयार हो गया। इस ईद से हमें यह पाढ मिलता है कि मनुष्य को ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने के लिए हर प्रकार के त्याग के लिए तैयार रहना चाहिए।

ईद का अर्थ वापसी है। यानी इस दिन इंसान महान ईश्वर की ओर वापसी करता है। इस पवित्र दिन में महान ईश्वर की कृपा और दया की बरसात मोमिन बंदों पर होती है। तो आइये इस दिन में उपासना और प्रार्थना करके हम अपने दिलों को पापों से विशुद्ध बनायें और स्वयं को अधिक से अधिक इस दिन की बरकतों से लाभांवित होने के लिए तैयार करें।

ईश्वरीय दूत हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपनी पत्नी हाजर और अपने प्राणप्रिय पुत्र इस्माईल को मक्के में छोड़ दिया था और थोड़े-2 दिन पर उनसे मिलने के लिए जाते थे। हज़रत इस्माईल दिन- प्रतिदिन बड़े हो रहे थे। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने बेटे हज़रत इस्माईल को गोद में लेते थे उन्हें प्यार करते और चूमते थे। एक दिन हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने स्वप्न में देखा कि महान ईश्वर उन्हें आदेश दे रहा है कि वह हज़रत इस्माईल को ज़िब्ह करें। इस पर उन्हें विश्वास नहीं आ रहा था।

पहले तो उन्होंने सोचा कि यह स्वप्न से अधिक कुछ और नहीं है किन्तु दूसरी और तीसरी रात को भी यही स्वप्न देखा। उस वक्त हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को पूर्ण विश्वास हो गया कि यह महान ईश्वर का आदेश है। उन्होंने सारा स्वप्न अपने प्राणप्रिय बेटे हज़रत इस्माईल से बताया तो उन्होंने कहा कि हे पिता! जो आदेश आपको दिया गया है उसे अंजाम दीजिये इंशा अल्लाह आप मुझे धैर्य करने वालों में पायेंगे। बहरहाल काफी असमंजस के बाद उन्होंने अपने प्राणप्रिय पुत्र हज़रत इस्राईल को ज़िब्ह करने का फैसला किया। बाप और बेटे दोनों उस स्थान पर पहुंचे जहां कुर्बानी करनी थी। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने बेटे की कुर्बानी करने के लिए तैयार हो चुके थे परंतु जब वह हज़रत इस्माईल की कुर्बानी करना चाह रहे थे और छुरी उनके गले पर चला रहे थे तो गला नहीं कटा। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने महान ईश्वर से कहा हे ईश्वर क्यों मेरी कुर्बानी कबूल नहीं कर रहा है? तो आवाज़ आई हे इब्राहीम! तुम इम्तेहान में सफल हो गये। उसके बाद महान ईश्वर ने हज़रत इस्माईल के बजाये हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास कुर्बानी के लिए एक भेड़ा भेजा और उसे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने ज़िब्ह किया।

ईदुल अज़हा, त्याग, कुर्बानी, निष्ठा और प्रेम की ईद है। अपने प्राणप्रिय बेटे हज़रत इस्माईल को महान ईश्वर की प्रसन्नता के लिए कुर्बान कर देना हज़रत इब्राहीम की कड़ी परीक्षा थी। यह ईद उसी की याद दिलाती है। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने काबे का निर्माण पूरा करने के बाद हज का आदेश दिया और हज संस्कार को कानूनी रूप दिया। 100 साल जीवन व्यतीत करने के बाद वह बूढ़े हो गये थे और इस उम्र में उन्हें अज्ञानी जाति और अत्याचारी शासक नमरूद का सामना हुआ। उसके बाद महान ईश्वर की ओर से उन्हें अपने बेटे हज़रत इस्माईल को ज़िब्ह करने का आदेश मिला। यह उनकी बहुत बड़ी व कठिन परीक्षा थी। महान व सर्वसमर्थ ईश्वर हर इंसान की परीक्षा उसके ईमान के लेहाज़ से लेता है और ईश्वरीय दूतों की परीक्षा कठिन और सख्त होती है।

ईदे क़ुरबान के अवसर पर मुसलमान प्रतिवर्ष जश्न मनाते हैं। इस अवसर पर वे गुस्ल करते हैं, अच्छे और नये कपड़े पहनते हैं, इत्र लगाते हैं, ईद की नमाज़ पढ़ते हैं और एक दूसरे से मिलने- मिलाने जाते हैं। इस दिन हाजी की ओर से कुर्बानी कराना अनिवार्य है और दुनिया के कोने- कोने से लाखों और करोड़ों मुसलमान भी कुर्बानी कराते हैं। वे महान ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने और तक़वा हासिल करने के लिए ऐसा करते हैं। मुसलमान इस दिन भेड़, बकरी और ऊंट आदि की कुर्बानी करते हैं और उसके मांस को निर्धनों में बांटते हैं। इस्लामी रवायतों में बारमबार आया है कि ईदे कुर्बान के दिन कुर्बानी करो ताकि भूखों और असहाय लोगों को भोजन मिले।

पवित्र इस्लाम धर्म ने अतीत की जातियों और क़ौमों के बीच प्रचलित क़ुरबानी की प्रथा की पुष्टि नहीं की और न ही उसने जानवरों को जलाकर ईश्वरीय सामिप्य प्राप्त करने की कोशिशों को सराहा है।  ईदे क़ुरबान के दिन जानवरों की क़ुरबानी लोगों की भलाई और ग़रीबों और दरिद्रों के बीच जानवर का मांस बांटने के लिए होती है।

ईदे कुरबान के दिन कुरबानी कराने और मांस को निर्धनों में बांटने के अलावा कुछ दूसरे कार्य भी मुस्तहब हैं। मुस्तहब ग़ैर अनिवार्य कार्यों को कहते हैं। इनके अंजाम देने पर पुण्य मिलता है परंतु अगर अंजाम न दिया जाये तो कोई पाप नहीं है। इस दिन कुछ नमाज़ें और दूसरे कार्य भी मुस्तहब हैं। यह दिन धार्मिक कार्यों को अंजाम देने का एक अवसर है।

स्वर्गीय इमाम खुमैनी कहते हैं” हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने हमें और समस्त इंसानों को यह सिखा दिया कि ईश्वर के मार्ग में कुर्बानी एकेश्वरवाद और उपासना के पहलु से कहीं अधिक राजनीतिक और सामाजिक पहलु रखती है। हमें और समस्त इंसानों को सिखा दिया कि अपने जीवन के सबसे प्रियतम की क़ुरबानी ईश्वर के मार्ग में दें और ईद मनायें। स्वयं और अपने प्रियजनों की कुरबानी करें और ईश्वरीय धर्म और न्याय को स्थापित करें।

क़ुरबानी के पीछे हिकमत यह है कि जब एक जानवर को हम ज़िब्ह करते हैं और एक जानवर की जान ले लेते हैं क्या यह ईश्वर की सृष्टि पर अत्याचार नहीं है, नहीं यह ईश्वर की किसी सृष्टि पर अत्याचार नहीं बल्कि यह कहा गया है कि जब ज़िब्ह करो तो ईश्वर का नाम लो ताकि यह पता चले कि जिसने इसको पैदा किया है और उसकी ओर से इसकी जान लेने का आदेश आया है। ईदे कुर्बान हर प्रकार की मोहमाया को कुर्बान कर देने का नाम है। जब इंसान अपनी मोहमाया और हर प्रकार के सांसारिक बंधन को महान ईश्वर की प्रसन्नता पर कुर्बान कर देगा तब उसे आध्यात्मिक शक्ति मिलेगी और वह उसकी छत्रछाया में परिपूर्णता के शिखर को तय करेगा।


मर्थ ईश्वर ने हज़रत हाबील की कुर्बानी स्वीकार की थी क्योंकि वह सच्ची निष्ठा के साथ महान ईश्वर के लिए थी जबकि काबील की कुर्बानी स्वीकार नहीं की।